
एक बार की बात है, एक बड़े हरे-भरे बगीचे में एक नन्ही चींटी रहती थी — नाम था अन्या।
अन्या को सर्दियों के लिए खाना जमा करना बहुत पसंद था।
एक धूपभरी सुबह, उसे एक पेड़ के नीचे एक बड़ी सी कुकी मिली।
वह इतनी बड़ी थी कि अन्या से भी बड़ी!
"ओह वाह! ये पूरी कुकी मेरी है!" अन्या खुशी से चिल्लाई।
उसने कुकी को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत भारी थी।
तभी उसका दोस्त — टिम भृंग (beetle) वहाँ आया।
"हैलो अन्या! ये कुकी तो स्वादिष्ट लग रही है। क्या मैं थोड़ा सा खा सकता हूँ?" टिम ने पूछा।
अन्याने मुँह बनाया, "नहीं! मैंने इसे पहले देखा है। ये मेरी है!"
और उसने कुकी को धक्का दिया।
लेकिन कुकी लुढ़कते हुए एक कीचड़ वाले गड्ढे में गिर गई — छींटाक!
अब वह गीली, टूटी हुई और खाने लायक नहीं रही।
अन्याउदास होकर बैठ गई। "ओह नहीं… मेरी कुकी!"
तभी टिम फिर से आया — इस बार अपने दोस्तों के साथ:
बेला तितली, सैम गिलहरी, और मिया चुहिया।
वे सभी कुछ न कुछ खाने का सामान लाए थे — मेवे, जामुन, और शहद की मिठास।
"चिंता मत करो, अन्या," टिम मुस्कराया। "हम सब कुछ मिलकर बाँट लेंगे!"
अन्या का दिल खुशी से भर गया।
उसे उस दिन एक बहुत जरूरी बात समझ आई:
“बाँटने से छोटी चीजें भी बड़ी और आनंदमय हो जाती हैं।”
उस दिन के बाद से अन्या ने हमेशा बाँटना सीखा — और फिर वो कभी अकेली या भूखी नहीं रही।
कहानी से सीख :
बाँटने से खुशी मिलती है!