
दुनिया के एक कोने में, जहाँ पेड़ बातें करते थे और पहाड़ों पर बादल झूलते थे, वहाँ छिपी थी एक रहस्यमयी जगह — गुनगुन घाटी।
वहाँ जाना आसान नहीं था, और न ही वहाँ से कोई लौट कर आया था। लोग बस लोरी और लोकगीतों में उसका ज़िक्र करते थे।
पर एक 11 साल की लड़की थी — मीरा — जो मानती थी कि गुनगुन घाटी सच में है।
मीरा एक शांत गाँव में रहती थी जहाँ हवा हर समय कुछ न कुछ फुसफुसाती रहती थी। उसे एक अनोखा उपहार मिला था — वो हवा की बातें सुन सकती थी।
एक रात, जब वह अपने दादी के पुराने पेड़ के नीचे बैठी थी, हवा ने कहा:
"आओ, खोजो गुनगुन घाटी का दिल, जहाँ खामोशी में सच्चाई उगती है।"
मीरा ने अपनी दादी का कंपास, एक छोटा सा बांसुरी और एक डायरी लेकर सफर शुरू किया।
रास्ते में उसने देखे चमकते मैदान, भावनाओं से बदलते जंगल, और वो पहाड़ जहाँ बच्चों की हँसी गूंजती थी।
उसे मिले अंधेरे से डरने वाला एक तिलचट्टा, पहेलियाँ बोलने वाली एक लोमड़ी, और दो जुगनू जो अंधेरी गुफा में रास्ता दिखाते थे।
हर पड़ाव पर उसे किसी न किसी की मदद करनी पड़ी, डर को जीतना पड़ा, और खुद पर विश्वास करना पड़ा। और हर बार, हवा उसकी मदद करती रही।
अंत में, मीरा पहुँची गुनगुन घाटी के बीच में — वहाँ एक विशाल पेड़ खड़ा था, जो नीली रोशनी से चमक रहा था। हवा फिर बोली:
"पूछो अपना सवाल, मीरा ।"
मीरा ने पूछा:
"इस दुनिया में मेरा क्या स्थान है?"
कुछ पल के सन्नाटे के बाद, हवा ने उत्तर दिया —
"तू वो है जो सुनती है, जोड़ती है और भूली बातों को फिर से जीवित करती है। तू कहानियों की संरक्षक है।"
मीरा की आँखों में आँसू आ गए। उसे समझ में आ गया कि उसका उपहार केवल हवा की आवाज़ सुनना नहीं था — बल्कि उन चीज़ों को आवाज़ देना था जो कभी चुप थीं।
जब वह अपने गाँव लौटी, तो हर बच्चा उसके पास बैठकर उससे कहानियाँ सुनने आता। और जब कोई पूछता कि ये कहानियाँ कहाँ से आती हैं, वो मुस्कुरा कर कहती:
"हवा सब कुछ याद रखती है, मैं बस सुनती हूँ।"
कहानी से शिक्षा :
सच्ची यात्रा आत्म-विश्वास, प्रकृति और दूसरों पर विश्वास से शुरू होती है।
जब हम ध्यान से सुनते हैं और निडर होकर आगे बढ़ते हैं, तब हम अपनी सच्ची ताकत को पहचान पाते हैं।