
एक हरे-भरे गाँव में बहुत सारे जानवर रहते थे। वहाँ हर दिन कुछ न कुछ दौड़, खेल और प्रतियोगिताएं होती थीं।
सबसे तेज़ और फुर्तीला था चीकू खरगोश, जो हमेशा जीतता था।
और सबसे धीमा था टोपी कछुआ, जो हमेशा आख़िरी आता था।
जब भी कोई रेस होती, सब टोपी का मज़ाक उड़ाते:
"अरे ये तो पहुँचते ही नहीं!"
"क्यों भागते हो टोपी? आराम करो!"
टोपी मुस्कराकर चुपचाप भागता रहता।
एक दिन जंगल में घोषणा हुई: “जंगल मैराथन”
सभी जानवर उत्साहित थे। चीकू को पूरा भरोसा था कि वही जीतेगा। लेकिन टोपी ने भी भाग लेने का फ़ैसला किया।
इस बार रेस की बात अलग थी — रास्ता लंबा था, पगडंडियाँ संकरी थीं, और बीच में नदी, कीचड़ और पेड़ गिरने जैसी मुश्किलें थीं।
टोपी रेस में भाग लेने वाला है यह सुन कर सब जानवर हँस पड़े, उसमे से हाथी ने कहा -
“टोपी? इतना लंबा रास्ता?”
“तू तो बीच रास्ते में ही सो जाएगा!”
रेस शुरू हुई...
चीकू बहुत तेज़ भागा, सबको पीछे छोड़ दिया।
टोपी धीरे-धीरे चला, अपनी चाल में।
रास्ते में चीकू कीचड़ में फिसल गया , लेकिन वो उठा और फिर से भागने लगा ।
फिर एक जगह चीकू को कुछ दिखा — एक छोटा बच्चा खरगोश रास्ता भटक गया था और डर के मारे काँप रहा था।
चीकू सोच में पड़ा —
“अगर मैं रुका तो हार जाऊँगा…” इसलिए चीकू वहाँ नहीं रुका और आगे बढ़ गया l
टोपी पहुँचा…
टोपी ने बच्चा खरगोश देखा, वह रुक गया , उस बच्चे के पास जाकर उसने उसे अपनी पीठ पर बिठा लिया, फिर वह धीरे धीरे चल पड़ा।
सभी जानवर रेस में आगे थे… लेकिन टोपी धीरे धीरे चलता रहा।
आख़िरकार वो लाइन पर पहुँचा , वह सबसे अंत में पहुचा, लेकिन बच्चा खरगोश भी उसके पीठ पर था ।
सभी जानवर टोपी के साथ उस बच्चे खरगोश को देख कर चौंक गए!
फैसला हुआ: असली विजेता… टोपी!
जंगल के मुखिया बोले:
“रेस जीतना ज़रूरी नहीं, दूसरों की मदद करना भी जीत ही है।” सभी जानवर मिलकर टोपी के लिए ताली बजाने लगे l
वो धीमा ज़रूर था… लेकिन सबसे प्यारा और सच्चा दोस्त भी वही था।
कहानी से सीख :
"गति नहीं, नीयत सबसे ज़रूरी होती है।" धीरे चलो, लेकिन सही राह पर चलो। और जब ज़रूरत हो, दूसरों की मदद करना कभी मत भूलो।