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मिक्की  एक छोटा सा भूरा पप्पी था, जो एक शांत से गाँव में रहता था। उसके कान बड़े-बड़े थे, पैर छोटे-छोटे, और नाक हमेशा कुछ सूँघती रहती थी।

दिन में मिक्की तितलियों के पीछे दौड़ता, धूप में खेलता और घास पर सो जाता।

लेकिन उसे एक चीज़ से बहुत डर लगता था, वह था अंधेरा।

मिक्की अंधेरे से बहुत डरता था l 

हर रात जब सूरज छिपता और तारे निकलते, मिलो बिस्तर के नीचे छिप जाता। उसे लगता रात बहुत डरावनी होती है। वह रात में कभी नहीं खेलता था l 

एक शाम उसके दादाजी, जिनका नाम राव था , जो मिक्की का ख्याल रखते थे, बोले,
“चलो मिक्की , थोड़ी चाँदनी रात में टहलते हैं।”

मिक्की ने सिर हिलाया और डर के मारे अपने कान नीचे कर लिए। वह बाहर बिल्कुल भी नहीं जाना चाहता था l 

दादाजी मुस्कराए, उन्होंने मिक्की को गोद में उठाया और बोले,
“रात हमेशा  डरावनी नहीं होती, तुम्हें हिम्मत करके एक बार बाहर आकर रात में चाँद की रोशनी को देखना चाहिए ।”

वे बाहर निकले। गाँव शांत था। आकाश में तारे थे और चाँद बहुत बड़ा और गोल था, जैसे मक्खन का गोला।

चलते-चलते मिक्की ने देखा कि झींगुर गा रहे थे, जुगनू टिमटिमा रहे थे, और पास की झील से मेंढ़क टर्र-टर्र कर रहे थे। ठंडी हवा उसके कानों को छू रही थी। सब कुछ शांत और सुंदर था।

मिक्की ने फूलों की खुशबू सूँघी — वह चमेली थी। उसने देखा कि रात बहुत सुंदर और शांत  है।

थोड़ी देर बाद वे एक बेंच पर बैठ गए। दादाजी ने कहा,
“देखा मिक्की? रात कितनी शांत है और यहाँ सब कुछ कितना अच्छा लग रहा है ।”

मिक्की ने हल्की सी भौंक दी — जैसे कह रहा हो, “हाँ!”

थोड़ी देर के बाद दादा जी मिक्की को वापस घर ले गए l 

उस रात, मिक्की बिस्तर के नीचे नहीं छिपा। वह खिड़की के पास लेट गया और चाँद को देखते-देखते सो गया।

अब रात उसका डर नहीं, उसकी नयी दोस्त बन गई थी।

कहानी से सीख :

कई बार जिससे हम डरते हैं, वह बस कोई अनजानी चीज़ होती है। जब हम उसे समझते हैं, तो वह हमारी दोस्त बन सकती है।

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