
जब तारा छोटी बच्ची थी, उसे सोने से पहले कहानियाँ सुनना बहुत पसंद था।
लेकिन कई बार, लाइट बंद होने के बाद भी उसकी आँखें खुली रहती थीं।
वह तारों को देखते हुए दूर-दराज़ की जगहों का सपना देखती थी।
एक रात, ठीक 9 बजे, तारा ने अपने बगीचे से हल्की छुक-छुक की आवाज़ सुनी।
उसने खिड़की से बाहर देखा और अपनी आँखें मलीं।
बगीचे के बीचों-बीच एक चमकती हुई चाँदी की ट्रेन खड़ी थी — जो चाँदनी में चमक रही थी।
उसके किनारे तारें झिलमिला रही थीं, और इंजन के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी।
“तारा, नींद भरी चाँदनी ट्रेन तुम्हारे जैसे सपने देखने वालों के लिए आई है!”
एक मीठी आवाज़ गूंजी।
तारा चुपचाप अपने टेडी बियर को लेकर बाहर निकली।
ट्रेन का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर बादल जैसे तकिए बिछे थे और धीमी मधुर धुन बज रही थी।
पहले से कई बच्चे अपनी पजामे में अंदर बैठे थे — गर्म दूध पीते हुए और कहानियाँ पढ़ते हुए।
धीरे-धीरे ट्रेन चल पड़ी… छुक-छुक-छुक… फूंssshh!
ट्रेन बगीचे से उड़ते हुए छतों के ऊपर पहुँच गई!
वह बादलों के ऊपर उड़ रही थी और चमकदार तारों की धूल उड़ाती जा रही थी।
पहला पड़ाव: माशमैलो पहाड़
बच्चे बाहर उतरे और फूले-फूले माशमैलो पहाड़ियों पर उछलने लगे।
वे हँसते-हँसते झपकियाँ लेने लगे।
दूसरा पड़ाव: फुसफुसाते पेड़ों का जंगल
यहाँ पेड़ लोरी गा रहे थे।
तारा अपने टेडी को कसकर पकड़कर सुनती रही।
अब उसकी पलकों पर भारीपन आने लगा।
तीसरा पड़ाव: सपनों की इंद्रधनुषी झील
यहाँ उन्होंने देखा — चाँद के बतख, उड़ती मछलियाँ, और गाने वाला झरना।
तारा ने चुपचाप पानी में पैर डालते हुए एक छोटी सी इच्छा माँगी।
फिर ट्रेन ने धीरे से सीटी दी —
“सपने देखने वालों, अब घर चलने का समय है…”
तारा खिड़की से सिर टिकाकर बैठ गई।
तारे अलविदा कह रहे थे।
चाँद मुस्कुरा रहा था।
जब ट्रेन वापस बगीचे में उतरी, तारा गहरी नींद में थी।
अगली सुबह, तारा अपने बिस्तर में उठी।
क्या वह सपना था?
या सच में चाँदनी ट्रेन आई थी?
मुस्कराकर उसने तकिए के नीचे देखा —
वहाँ एक तारे के आकार का छोटा टिकट रखा था।
अब तारा को यक़ीन हो गया —
वह सपना नहीं था।
कहानी से सीख :
सबसे सुंदर सपने उसी को मिलते हैं, जिसका मन शांत और जिज्ञासु होता है।