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जंगल के सुंदरवन नामक गाँव में दिवाली की धूम थी।
पेड़ों पर लाइटें लटक रही थीं, हर जगह मिठाइयों की खुशबू, और सबके चेहरे चमक रहे थे।

वहा एक छोटा हाथी था , जिसका नाम था गोलू

छोटा हाथी गोलू सबसे ज़्यादा उत्साहित था।
"इस बार मैं मंदिर सजाऊंगा!" उसने सूंड हिलाते हुए कहा।

उसकी दादी हाथी ने उसे एक पुराना सोने का दीया दिया।

“ये दीया पीढ़ियों से हमारे घर में है,” दादी बोलीं। “इसे भगवान गणेश जी के सामने रखना।”

गोलू बड़े गर्व से दीया लेकर चला।
पर तभी… एक गिलहरी उसके सामने से कूद गई — और चमाक!

दीया गिरकर टूट गया।

गोलू की आँखें फैल गईं।
“अब दादी कितना नाराज़ होंगी…”

वह डर गया। जल्दी से टूटे टुकड़े एक झाड़ी के पीछे छिपाए और घर भाग गया।

रात को सब दीये जला रहे थे… लेकिन गोलू चुप था।
मंदिर बहुत सुंदर लग रहा था… पर गोलू का मन बुझा-बुझा था।

दादी ने पूछा, “बेटा, दीया रखा मंदिर में?”

गोलू ने सिर झुका लिया। “नहीं दादी… वो दीया टूट गया… मैं माफ़ी चाहता हूँ।”

दादी मुस्कराईं और उसे गले लगा लिया।

“बेटा, मैं तेरी सच्चाई से खुश हूँ। दीये फिर से बन सकते हैं। पर सच्चे दिल का उजाला सबसे अलग होता है।”

फिर उन्होंने गोलू का मिट्टी का छोटा दीया लिया, और दोनों ने मिलकर भगवान के सामने जलाया।

दीये की लौ झिलमिलाई… और गोलू फिर से मुस्कराया।

उस दिवाली, गोलू ने सबसे पुराना दीया नहीं जलाया—
पर उसने जलाया सबसे अनमोल दीया — सच्चाई का।


कहानी की सीख :

"सबसे  ज्यादा उजाला  उसी दिल से आता है जो सच्चा होता है।"

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