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तमिलनाडु में एक छोटा सा गांव था , उस गांव में अरुण नाम का एक लड़का अपनी माँ के साथ रहता था। अरुण और उसका परिवार  किसान थे ।

अरुण को त्योहार बहुत पसंद थे, खासकर पोंगल, जब लोग गायों को सजाते हैं, मीठा पोंगल बनाते हैं और सूरज को धन्यवाद देते हैं।


इस साल भी गाँव में खूब तैयारी हो रही थी। रंगोली बन रही थी, मिठाइयाँ बन रही थीं, और बच्चे नए कपड़े पहनकर खेल रहे थे।

लेकिन अरुण के घर में कुछ भी खास नहीं था। वहाँ पोंगल की कोई भी तैयारी नहीं हो रही थी l

उसकी माँ ने बस सादा चावल और थोड़ा गुड़ बनाया था। कोई मिठाई नहीं, कोई गन्ना नहीं, और थाली भी लगभग खाली थी।

अरुण उदास होकर बोला, “अम्मा, हमारे पास कुछ क्यों नहीं है?”

माँ मुस्कराईं, “हमारे पास एक-दूसरे का साथ है, और थोड़ा खाना भी। हमारे पास इतना सब है यही हमारा असली त्योहार है।”

दोपहर को गाँव में सामूहिक भोज की तैयारी हो रही थी। तभी गाँव के बुज़ुर्ग ने अरुण को बुलाया, “बेटा, आकर मदद करेगा?”

अरुण बोला, “मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है।”

बुज़ुर्ग ने प्यार से कहा, “एक अच्छा दिल ही सबसे बड़ी चीज़ है।” जो तुम्हारे पास है l 

अरुण उस बुजुर्ग की बात सुन कर वहाँ सभी की मदद करने चला गया l 

अरुण ने पानी पहुँचाया, केले के पत्ते धोए, और बुज़ुर्गों को खाना परोसा। हर कोई उसके काम से खुश था, हर मुस्कान के साथ उसका दिल हल्का होता गया।

लोगों ने उसे मिठाइयाँ, गन्ने और आशीर्वाद दिया।

शाम को एक व्यक्ति ने उसे एक बड़ी थाली दी — जिसमें मीठा पोंगल, केले, दूध और स्नैक्स थे।

बुज़ुर्ग ने कहा, “देखो अरुण, जब दिल भरा हो, तो थाली कभी खाली नहीं रहती।”

उस रात, अरुण और उसकी माँ ने मिलकर वही थाली खाई। उनके पास सजावट नहीं थी, लेकिन उनके दिल में असली त्योहार की रौशनी थी।

कहानी से सीख :

त्योहार दिखावे का नहीं, दिल से देने और आभार जताने का नाम है।

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