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होली आ गई थी इंद्रधनुष नगर में!
बच्चे पानी वाले गुब्बारों से खेल रहे थे, चारों ओर रंग और हँसी छाई हुई थी।

मीना, दो लंबी चोटी वाली प्यारी लड़की, पूरे साल इस दिन का इंतजार कर रही थी।

“इस बार मैं सबको सिर से पाँव तक रंग दूँगी!” वह हँसते हुए बोली।

जैसे ही मीना ने अपनी पिचकारी भरी, उसने देखा — एक लड़की पेड़ के नीचे चुपचाप बैठी थी।

वो थी तारा, स्कूल में नई आई थी।

“तुम खेल क्यों नहीं रही हो?” मीना ने पूछा।

तारा ने धीरे से कहा, “मुझे स्किन एलर्जी है… रंग लगाने से खुजली और जलन होती है।”

इतना कहने के बाद तारा फिर से उदास हो गयी l  

मीना के हाथ रंग से भरे थे, लेकिन उसका दिल थोड़ा उदास हो गया।

पूरे दिन वो तारा के बारे में सोचती रही। और उसी रात, मीना के मन में एक आइडिया आया।

अगली सुबह, मीना ने फिर से सब बच्चों को बुलाया —
पर इस बार, कुछ अलग लेकर:

 कागज के फूल
रंग-बिरंगे दुपट्टे
और ढेर सारा संगीत और नाच!

पानी वाले गुब्बारे नहीं… बस रंगीन झप्पियाँ

तारा ने उस दिन सबसे प्यारी मुस्कान दी।

“ये मेरी सबसे अच्छी होली है,” तारा ने धीरे से कहा।

और मीना?
उसे पुराने रंगों की होली ज़रा भी याद नहीं आई।

अब उसे मिल गया था नया तरीका — प्यार से रंगने का।

कहानी की सीख :

सच्चा त्योहार वही होता है जिसमें हर कोई खुशी से शामिल हो सके। जब हम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखते हैं, तभी असली आनंद मिलता है।

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